🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-80] ▪
🔅 विश्व का केन्द्र हो गई है द्वारिका। अत: क्या अनुचित है यदि मईया प्रत्येक अतिथि अभ्यागत से पूछती है--'मेरे कन्हैया को देखा है आपने? आपने उसके सम्बन्ध मेँ कुछ सुना है? वह सकुशल है? प्रसन्न है?
▪सच बात है कि ब्रज मेँ अधिकांश अतिथि द्वारिका होकर ही आते हैँ। जो एक बार यहाँ हो गये हैँ, वह यदि सिद्ध ऋषि मुनि हुए तो यहाँ पुन: आने से पहले द्वारिका हो आते हैँ। उन्हेँ इस ब्रजेश्वरी को द्वारिका का सम्वाद देना रहता है।
🔅जो द्वारिका पहुँचते हैँ, उन्हेँ ब्रज का, ब्रजवासियोँ का, नन्दबाबा का और मईया का इतना महात्मय सुनने को मिलता, ब्रज आये बिना उनसे रहा नहीँ जाता।
▪'पता नहीँ कैसा है ब्रज और कैसे हैँ ब्रज के लोग? 'द्वारिका के जन-जन के मुख पर प्राय: एक ही चर्चा रहती है,'हमारे वासुदेव तो वहाँ की चर्चा से ही विभोर हो जाते हैं और संकर्षण ही नहीँ महामन्त्री उद्धव जैसे साक्षात् देवगुरु बृहस्पति के शिष्य भी ब्रज की चर्चा चलने पर अपने शरीर की सुधि तक विस्मृत कर बैठते हैँ।'
🔅ऋषि-मुनियों को,सिद्ध तपस्वियों को,महर्लोक,जनलोक तथा सत्यलोक के भी देवर्षि,परमर्षिवर्ग को श्रीकृष्ण के दर्शन से अधिक दूसरा कोई आकर्षण समाधि मेँ भी नहीँ रह गया है। द्वारिका जाना है इन्हेँ उन श्रीद्वारिकाधीश के दर्शन करने और द्वारिका जाने पर ब्रज की चर्चा न सुनने को मिले, सम्भव नहीँ है। द्वारिका जाने पर सबको अनुभव होता है कि ब्रज का दर्शन किये बिना उसकी द्वारिका-यात्रा अर्थहीन है। द्वारिका का सार्थक ही है ब्रज का प्रसाद।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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