🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-42] ▪
📬 कल हमने पढ़ा कि "मईया एक दरिद्र भिक्षुक के समान याचना करती है कि-कन्हैया को बुला रहो! इस शीतकाल में चार दिन यहां रहकर कुछ खा जाये तो तनिक पुष्ट हो जायेगा। अब आगे......
🔅ब्रज की देवता हैँ गायेँ,अत: गोष्ठ सबसे बड़ा तीर्थ है। वैसे भी गोशाला नित्य पवित्र होती है। गायेँ सर्व ही देवमयी हैँ।
▪कन्हैया अपने शैशव मेँ जब चाहे गोशाला मेँ पहुँच जाने पर व्यसनी रहा है। यह कैसे सम्भव है कि ब्रजेश्वर को गोष्ठ मेँ जाने ही न दिया जाय;किन्तु वे गोष्ठ मेँ जाकर आत्यधिक विक्षिप्त हो जाती हैँ। उन्हेँ लगता है कि गोष्ठ का कण-कण 'कन्हैया! कन्हैया! पुकारता है। उन्हेँ ही नहीँ पूरे ब्रज के गोपो को,गोपियो को भी यही लगता है और केवल नन्द-गोष्ठ मेँ ही नहीँ,ब्रज के प्रत्येक गोष्ठ मेँ लगता है।
🔅इसलिए अब तो गोपियाँ,गोप-कन्याएँ भी अवसर मिलते ही गोष्ठ मेँ जा बैठती है। गोष्ठ ही सबके उपासना-स्थान तथा एकान्त बैठने के भी स्थान बन गये हैँ। तब मईया को भी कैसे गोष्ठ मेँ जाने से रोका जा सकता है।
▪गोष्ठ मेँ पहुँचते ही गोपियो के मन मेँ स्मृतियों का मेला लग जाता है।
🔅एक गोपी कहती हैँ- कन्हैया को देख कर मैँ जान-बूझकर सिरके वस्त्र खिसका देती थी और उनसे ठीक कर देनेँ को कहती थी। वे हँसते हँसते आते थे। चाची-चाची करते थे। कभी तो वस्त्र और पिछे गिरा देते और कभी इतना लम्बा घूँघट खीँच देते जितना कोई नव वधू भी नहीँ खीँचती।' पहले तो मुझे माखन देने के लिए कहते और कभी मेरा ही पयपान करना चाहते थे।'
▪मैँ कहती थी-'मेरे हाथ गोबर से सने हैँ। माखन यहाँ गोष्ठ मेँ कहाँ है। गोबर उठाकर घर चलने दो तो माखन दूँगी।'
▪'मैँ तो अभी लूँगा।' कन्हैया का मचलना चलता रहता था और मेरे वस्त्र को सिर पर टिकना नहीँ था।'
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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