Friday, 11 December 2015

unmadini yashoda 107

🔆           [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-107]  ▪

🔅मईया तनिक गम्भीर दीखने लगती है। 'मैँ कन्हैया को स्पर्श नहीँ कर सकूँगी? नहीँ स्पर्श तो नहीँ करुँगी। भूतनी उसे कैसे स्पर्श करेगी?'

▪मईया फिर हँसने लगती और कहती है--'मैँ उसे देख सकूँगी। देखती रहूँगी और वह मुझे नहीँ देखेगा। वह अपने काम मेँ लगा रहेगा। उसे पता भी नहीँ लगेगा कि उसकी मईया उसके समीप ही है।'

🔅सबके समीप मईया को सावधान करने की यही बात है--वह सुनेगा कि आपने उनके वियोग मेँ देह त्याग दिया, तब ?

▪'कौन कहेगा उससे? द्वारिका तो सुना बहुत दूर है।' मईया जैसे कुछ सोचने लगती है--'भूत प्रेतों को तो दूर जाने मेँ श्रम नहीँ होता? मुझे कौन सा वहाँ जाकर फिर यहाँ लौटना है। मुझे कोई ऐसी अकेली जाने नहीँ देता। कोई मुझे मेरे लाल तक ले नहीँ जाता। मैँ मरकर भूतनी बनूँगी, तब मुझे कोई रोक नहीँ सकेगा।'
'मैँ कन्हैया के समीप जाऊँगी। कोई मुझे रोक नहीँ सकेगा। मईया हँस रही है, हँसे जा रही है। रुदन से भी भयानक इनकी हँसी-गोपियाँ , सेविकाएँ, स्तब्ध,भीत,शंकित हैं। समझ नहीँ पाती हैँ कि वे अपनी स्वामिनी को कैसे सावधान करेँ। ब्रजेश्वर को बुलाये बिना उपाय नहीँ।

🔅बाबा भरे कंठ से कहते हैँ--'महर! तुम मुझे छोड़कर चली जाओगी?'

▪'महर! इस ब्रज मेँ धरा क्या है? तुम भी चलो। 'मईया हँस रही है--'हम कन्हैया के पास जायँगे। हम दोनों मरकर भूत-भूतनी बनकर उसके पास चलेँगे।'

🔅बाबा अपना अमोघमन्त्र दुहराते हैँ--महर! वह आयेगा-यहाँ ही आयेगा।' और सुनेगा कि मेरे वियोग मेँ मेरे बाबा और मईया रो-रोकर, तड़प-तड़प-कर मर गये, तब क्या दशा होगी उसकी?'

▪'नहीँ! नहीँ!नहीँ!' मईया चीत्कार कर उठती है। इसका हास्य विदा हो जाता है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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