Friday, 11 December 2015

unmadini yashoda 97

🔆            [जय गौर हरि]            🔆
▪        [उन्मादिनी यशोदा-97] ▪

🔅मईया अनन्त वात्सल्यमयी है। इनकी गोद मेँ किसी के लिए भी आश्रय का अभाव नहीँ है;किन्तु उद्धव का साहस मईया के सम्मुख पड़ने का नहीँ होता था। प्रात: अँधेरा रहते ही निकल जाते थे और रात्रि मेँ अन्धकार हो जाने पर लौटकर मईया की पद-वन्दना करते थे।

▪उद्धव का सौभाग्य कि उन्हेँ एक बार श्री कीर्तिकुमारी के श्रीचरणोँ के सम्मुख मस्तक रखने का अवसर भी मिल गया। महाभाव की उस घनीभूति मूर्ति के सम्मुख भी पुन: जाने का साहस उद्धव अपने मेँ नहीँ पा सके।

🔅उद्धव बचते रहे ब्रज मेँ गोप-बालकों से भी। उन्हेँ लगता था कि कन्हैया के सखाओं के समीप पहुँचने पर उनके शरीर के अणु-अणु किसी अतर्क चिदघनाकर्षण से खिँचकर बिखर जायेंगे। उद्धव की बुद्धि विवेक सब उनके सान्निध्य मेँ सत्ता खो बैठते थे।

▪उद्धव को वात्सल्य मिला बड़े गोपों का,वयस्का गोपियों का और इनके सामीप्य मेँ उद्धव भूल ही गये अपने को। गोप-बालिकाओं ने सम्मान दिया,साथ ही कन्हैया की प्रीति-दीक्षा दी।

🔅उद्धव कृतार्थ हो गये। दो मास पता नहीँ लगा कि ब्रज मेँ कैसे व्यतीत हो गये।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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