🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-87] ▪
🔅मईया किसी हंस के आँगन मेँ उतरते ही उसे कुछ खिलाने दौड़ती है और अपने अंक मेँ पुचकार कर बैठाती है--'कन्हैया प्रसन्न है?'
▪'मेरे कन्हैया से ऐसा कुछ मत कहना,जिससे वह उदास हो जाय।' मईया केवल हंसो से ही नहीँ,सारसो,कपोतो,नन्हीँ बुलबुलो से भी अपने कन्हैया की बातेँ करती रहती है।'
🔅'मैँ तुम्हारी बात नहीँ समझ पाती। गाँव की ग्वालिन ही तो हुँ;किन्तु कन्हैया तो शैशव से तुम सबकी बात समझता था।'
▪मईया विभोर होकर कहती है--'वही मुझे बतलाता था कि कपोत क्या कहता है अथवा गिलहरी क्या माँगती है।
🔅मईया के आँगन मेँ तो पशु-पक्षी सभी मिल ही रहे हैँ। पक्षी स्वतन्त्र है पशुओँ के शरीर पर बैठने या उनके पैरो के घूमने को। यह तो किसी भी बालक गोपी या गोप के कन्धे पर सिर पर चाहे जब चाहे बैठ जाने वाले हैँ।
▪मईया पशुओँ पर अत्यन्त सदय है तो पक्षियो पर इसका स्नेह उमड़ पड़ता है। पशु कन्हैया के वियोग मेँ दुर्बल,दीन हो रहे हैँ;किन्तु पक्षियो की दुर्बलता इनके पंख छिपाये रहते है। अवश्य इनके पंख मलिन हो रहे हैँ-किन्तु मईया का ध्यान इधर कम जाता है। यह समझ नहीँ पाती कि पक्षी उदास क्यो दीखते हैँ।'
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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