🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-82] ▪
🔅'यह तो शारदीय वर्षा है।' गोपियाँ मईया को आश7्वासन देती रहती हैँ। लेकिन मईया इतनी भी स्वस्थ कितने दिन रहती है? कोई ऋषि-मुनि आये तो उनका सत्कार इसका व्यसन है। स्वस्थ हो या अस्वस्थ अतिथि के सत्कार मेँ जाती;किन्तु कोई द्वारिका के समाचार सुनाने लगेगा, कन्हैया की चर्चा करेगा तो हक्की-बक्की हो उठती।
▪'कन्हैया,अच्छा! मन मेँ कहती--पता नहीँ किसके कौन से कन्हैया की बात है?'
🔅मेरे कन्हैया को आशीर्वाद दे जाइये! वह सो रहा है।' अपनी शय्या पर से उत्तरीय से ढका तकिया उठाने जाती।
▪'यह तो तकिया है।' ऐसे अवसर पर सेविकाओँ को कहना ही पड़ता है।
🔅'अच्छा! मईया अपने उन्माद मेँ फिर भी हँसती--'मैँ ही पगली हूँ। वह बड़ा हो गया है। गायें चराने गया है। किसी को भेजकर उसे बुला ले। तब तक मैँ ऋषि महाराज को रोकती हूँ। यह उसे आशीर्वाद देँगे।
▪सेविका को कहना पड़ता है--मईया यह ऋषि महाराज आपके कन्हैया का ही तो समाचार देने आये हैँ। सेविका जानती है वह तो बड़े भाई के साथ मथुरा से भी द्वारिका चला गया है। सेविका जानती है कि अभी सावधान नहीँ करेगी तो कुछ स्वस्थ होने पर उसकी यह स्वामिनी बहुत अधिक दुखी हो जाएगी।
🔅मईया सावधान होकर अत्यधिक दुखी हो जाती है और कहती है--'वह प्रसन्न है? क्या करता है? कैसे रहता है? दुबला हो गया होगा।' मेरा लाल सुखी रहे।
▪मईया पता नहीँ क्या-क्या पूछना चाहती है; किन्तु कितनी भी उन्मादिनी हो,अपनी,अपने दुख की, ब्रज की चर्चा नहीँ करेगी। सदा इसे भय रहता है--'कोई यहाँ की चर्चा उससे जाकर न करे। वह सुनकर दुखी होगा।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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